विदेशेषु धनं विद्या व्यसनेषु धनं मति: !
परलोके धनं धर्म: शीलं सर्वत्र वै धनं !!
प्रिय सुन्दरसाथजी परदेशमें विद्या, विपत्तिमें सदबुद्धि, परलोकमें धर्म धन (सहायक) है, परन्तु शील-सदाचार तो ऐसा धन है, जो लोक और परलोक दोनोंमें साथ देता है ! इस प्रकार शील सार्वभौम सुखका साधन है !
न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्गं नापुनर्भवं !
कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनं !!
सर्वे भवन्तु: सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया: !
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु माँ कश्चिद् दुःखभागभवेत् !!
मनुष्य-जीवन में उत्तम शीलका बड़ा महत्त्व है, नम्रता और सहिष्णुता उत्तम शील्के दो अंग हैं, नम्रता महत्ताका प्रतीक है और सहिष्णुता मनुश्यताकी सूचक है !
पर-मत, पर-धर्म और पर-अभ्युदयमें सहिष्णुता एक महान गुण है, परन्तु अन्याय और स्वत्वापहरणमें सहिष्णुता महान दोष है, यह कायरताका रूप धारण कर लेती है ! उत्तम शील्के कारण अनेक पुरूष अजर-अमर हो गये !
महाभारत शान्तिपर्वमें एक अंतर्बोध कथा है- स्वर्ग के इन्द्र स्वयं ब्रह्मज्ञानी थे. एक समय वे अपने राज्यस भ्रष्ट हो गये ! तब उन्होंने अपने गुरु ब्रिहस्पतिसे पूछा-'भगवन ! मेरा श्रेय किसमें है ?' गुरुजीने कहा-'तेरा श्रेय आत्मज्ञानमें है !' इस उत्तरसे इन्द्रकी संतुष्टि नहीं हुई तो बृहस्पतिजीने उन्हें शुक्रचार्यके पास भेज दिया ! जब वहाँ भी संतुष्टि न मेली तो शुक्राचार्यने कहा-'मैं कुछ आधिक नहीं जानता, तुम प्रह्लादके पास जाओ !' अन्तमें राज्यभ्रष्ट इन्द्र ब्रह्मणवेशमें प्रह्लादके पास गये; शिष्य बन गये तो प्रह्लादने उपदेश दिया-'शील ही त्रिलोक्यका राज्य पानेकी सच्ची कुंजी है और यही श्रेय है !' इन्द्रके सेवा-भावसे प्रसन्न होकर प्रह्लादने कहा-वरं ब्रूहि !' इन्द्र बोले-आप मुझे अपना शील दे दीजिये !' प्रह्लादके 'तथास्तु' कहानेपर उनके शीलके साथ ही धर्म, सत्य, व्रत, श्री, एश्वर्य आदि सब गुण उनके शरीरसे निकलकर इन्द्रके शरीरमें प्रविष्ट हो गये ! फलत: शीलके कारण इन्द्र अपना राज्य पा गये !
२. सुकरात एक विचारक था-उसे मारनेके लिये जगर पीसा जा रहा था. उसके मित्रोंके नेत्रोंसे आँसू बह रहे थे, वह चुपकेसे बाहर जाकर जहर पीसनेवालेसे पूछता है-'मालूम होता है, तुम नये हो, तुमने कभी पहले फाँसीवालेके लिये जहर पीसा नहीं, तुम्हें इस दिशामें अनुभव नहीं, हाथ जल्दी चलाओ, देर न करो !' वह आदमी कहता है कि 'जिन्दगीभरसे यही काम कर रहा हूँ ! न मालूम कितनोंको फाँसी दे चुका, परन्तु तुम-जैसा सदाचारी, शीलवान आदमी देखनेमें नहीं आया !' सुकरातको जहर दिया गया, वह होशमें रहा और बोला-'जहरके प्रभावसे जंघाओंतक मेरे पैर मर गये ! हाथ मर गये, लेकिन मित्रो ! मैं जिन्दा हूँ ! मैं अभी भी हूँ ! मेरे भीतर मेरा शील है, वही मेरा आत्मा है ! जो अजर-अमर है, वह जहारसे, शास्त्रसे नहीं मरता !'
नैनं छिन्दन्ति शास्त्राणि नैनं दहति पावक: !'
३. क्राइस्ट जीससको शूली दी गयी ! वे चिल्लाये नहीं, रोये नहीं, बल्कि हँसे और मुसकराये ! उनके हाथोंको कीलोंसे गोंदा गया, पैरोंको छेदा गया, उनके नंगे गातसे लहू टपकने लगा, उनके मुंहसे निकला-'परमात्मा ! क्षमा कर देना इन लोगोंको; क्योंकि ये नासमझ हैं,-वे मेरे धर्मको, विचारको मारना चाहते हैं ! शील मेरे जीवनका सम्बल है ! वह सदा मेरे साथ है और सदा साथ रहेगा !!